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होम / गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन अधिनियम

आपराधिक कानून

तपस्या उमेश पिसाल बनाम भारत संघ (2017)

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 16-Jan-2026

परिचय 

यह एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसमें गर्भ का चिकित्सकीयसमापन अधिनियम, 1971 के अधीन निर्धारित सांविधिक बीस सप्ताह की सीमा से परे चिकित्सकीय गर्भसमापन की मांग करने वाले गर्भवती व्यक्तियों के सांविधानिक अधिकारों पर विचार किया गया हैविशेष रूप से उन मामलों में जहाँ गंभीर भ्रूणीय असामान्यताएँ पाई जाती हैं जो सामान्य जीवन के अनुकूल नहीं होतीं। 

तथ्य 

  • तपस्या उमेश पिसालएक 24 वर्षीय महिलाने अपने गर्भ का चिकित्सकीयसमापन की अनुमति प्राप्त करने हेतु संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का रुख किया।  
  • भ्रूण में ट्राइकसपिड तथा पल्मोनरी एट्रेसिया नामक गंभीर हृदय संबंधी विकृति का निदान किया गया थातथा याचिकाकर्त्ता को अपने जीवन के लिए संभावित खतरे की आशंका थी 
  • अगस्त, 2017 को किये गए चिकित्सकीय परीक्षा के समय याचिकाकर्त्ता गर्भावस्था के 24वें सप्ताह में थीजो गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 के अंतर्गत निर्धारित बीस सप्ताह की सांविधिक सीमा से अधिक था। 
  • न्यायालय द्वारा एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया जिसमें पुणे के बीजे गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ शामिल थेजिनमें प्रसूति एवं स्त्री रोगबाल हृदय शल्य चिकित्साबाल रोग और रेडियोलॉजी के विशेषज्ञ सम्मिलित थे। 
  • चिकित्सकीय बोर्ड ने याचिकाकर्ता की परीक्षा कर यह पुष्टि की कि भ्रूण में हाइपोप्लास्टिक राइट हार्ट के साथ ट्राइकसपिड एवं पल्मोनरी एट्रेसिया तथा अल्पविकसित पल्मोनरी धमनियाँ विद्यमान थीं। बोर्ड ने यह भी प्रतिवेदित किया कि आवश्यक शल्य चिकित्साएँ उच्च रोगग्रस्तता एवं मृत्यु-दर से जुड़ी होंगी तथा सुधारात्मक शल्य चिकित्सा के पश्चात भी ऐसे बच्चे सामान्य ऑक्सीजन स्तर प्राप्त नहीं कर पातेशारीरिक रूप से अक्षम रहते हैं तथा उनका जीवनकाल सीमित होता है 
  • बेंगलुरु के एक प्रख्यात हृदय शल्यचिकित्सकडॉ. देवी शेट्टी ने यह राय व्यक्त की कि ऐसे अधिकांश बच्चे वयस्क जीवन तक जीवित नहीं रह पाते हैं और ऑक्सीजन की कमी की समस्याओं के कारण अनिश्चित जीवन का सामना करते हैं।  
  • मेडिकल बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि जन्म के बाद बच्चे के गंभीर रूप से विकलांग होने या आकस्मिक मृत्यु होने की लगभग निश्चित संभावना थीऔर बच्चे को कई सर्जरी की आवश्यकता होगी जो उच्च रुग्णता और मृत्यु दर से जुड़ी होती हैं। 

सम्मिलित विवाद्यक  

  • क्या न्यायालय को गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 की धारा 3(2)(ख) के अधीन निर्धारित बीस सप्ताह की सांविधिक सीमा से परे गर्भ के चिकित्सकीय समापन की अनुमति देनी चाहियेउन मामलों में जहाँ भ्रूण गंभीर शारीरिक विकृतियों से पीड़ित है जिसके परिणामस्वरूप गंभीर विकलांगता होगी 
  • क्या गर्भावस्था की सांविधिक गर्भकालीन आयु सीमा से अधिक होते हुए भी याचिकाकर्त्ता के गर्भ का चिकित्सकीय समापन कराने के अधिकार को बरकरार रखा जाना चाहियेयह देखते हुए कि यदि बच्चा पैदा होता है तो उसमें शारीरिक विकृतियाँ होने का काफी जोखिम है जिससे वह गंभीर रूप से विकलांग हो सकता है? 

न्यायालय की टिप्पणियां  

गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम के प्रावधानों की प्रयोज्यता: 

  • न्यायालय ने पाया कि परिसीमा काल के सिवाययह मामला स्पष्ट रूप से गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 की धारा 3(2)(ख) के अंतर्गत आता हैजो गर्भसमापन की अनुमति तब देता है जब इस बात का पर्याप्त जोखिम हो कि यदि बच्चा पैदा होता हैतो वह ऐसी शारीरिक या मानसिक विकृतियों से पीड़ित होगा जिससे वह गंभीर रूप से विकलांग हो जाएगा  

चिकित्सकीय संबंधी साक्ष्य और भ्रूण का पूर्वानुमान:  

  • न्यायालय ने उपलब्ध व्यापक चिकित्सकीय साक्ष्यों का संज्ञान लेते हुए यह कहा कि यदि भ्रूण को जन्म लेने दिया जाता हैतो उसका जीवनकाल अत्यंत सीमित होगा और वह ऐसे गंभीर विकलांगताओं से ग्रस्त रहेगाजिन्हें टाला नहीं जा सकता। चिकित्सकीय सहमति के अनुसार यह निश्चित था कि शिशु वयस्क अवस्था तक जीवित नहीं रह पाएगा 

न्याय के हित: 

  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि न्याय के हित मेंऔर बच्चे की कुछ गंभीर विकलांगताओं और सीमित जीवनकाल को ध्यान में रखते हुएसांविधिक समय सीमा से अधिक होते हुए भी गर्भ का चिकित्सकीय समापन की अनुमति देना उचित होगा।  

निर्णयाधार 

  • इस निर्णय में यह विधिक सिद्धांत स्थापित किया गया कि असाधारण मामलों मेंजहाँ भ्रूण में ऐसी गंभीर असामान्यताएँ पाई जाती हों जो सामान्य जीवन के प्रतिकूल होंतथा जहाँ चिकित्सकीय मत सर्वसम्मति से यह पुष्टि करता हो कि शिशु में गंभीर विकलांगता एवं सीमित जीवनकाल का पर्याप्त जोखिम हैवहाँ न्यायालय न्याय के हित में सांविधिक गर्भावधि सीमा से परे भी गर्भ के चिकित्सकीय समापन की अनुमति प्रदान कर सकता हैविशेषतः तब जब ऐसा गर्भसमापन गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 की धारा 3(2)(के मौलिक मानदंडों के अंतर्गत आता हो। 

निष्कर्ष  

न्यायालय ने रिट याचिका स्वीकार कर ली और याचिकाकर्त्ता को गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 के प्रावधानों के अधीन अपनी गर्भावस्था को गर्भ के चिकित्सकीय समापन के अधीन अनुमति दी। गर्भसमापन उसी अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा किया जाना था जहाँ याचिकाकर्त्ता ने चिकित्सा परीक्षा करवाई थीन्यायालय द्वारा गठित चिकित्सा बोर्ड की देखरेख में। चिकित्सा बोर्ड को प्रक्रिया का पूरा रिकॉर्ड रखने का निदेश दिया गया था। यह निर्णय गर्भवती व्यक्तियों के सांविधानिक अधिकारों को सुदृढ़ करता है और गंभीर भ्रूण असामान्यताओं और गर्भसमापन का समर्थन करने वाले व्यापक चिकित्सकीय साक्ष्यों का सामना करने पर सांविधिक समय सीमाओं को लागू करने में न्यायिक लचीलेपन को दर्शाता है।